Poetry: जुनून और सुकून

जुनून और सुकून की ज़ंग बहुत अज़ीम है कभी चलते रहना भारी लगता है कभी ठहराव का बोझ बड़ा होता है चलते रहने में कई सवालात दिल को घेर लेते हैं कहाँ जा रहा हूँ कहाँ तक पहुँचा हूँ क्या यहीं आने के लिए निकला था और भी कई सवाल ना जवाब मिलता है कभी … [Read more…]

Poetry Recital at Lahe Lahe

कुछ मर गया है मुझ में इस लिए कविता लिखता हूँ कुछ लिखता हूँ अब बचे हुए खुद को ज़िंदा रखने के लिए यही सच है हर एक कवि के पीछे. कुछ दर्द के साए हैं जो बरस जाते हैं अनायास ही. कुछ इस बारिश से बिखर जाते हैं और कुछ इस बारिश से संवर … [Read more…]

Poem : सरहद

इक बार कभी इस सरहद पे कुछ ऐसा भी हो जाए तुम भी कुछ गीत सूनाओ हम भी कुछ गाने गायें   बहुत हो चुका खेल खून का अब थोड़ा संगीत करें तुम छेड़ो एक नुसरत की धुन हम भी रफ़ी के गीत कहें   माज़ी में तो खून है टपका तेरा भी और मेरा … [Read more…]

Poem : मुल्क आज़ाद हो गया है

अमन वाली बस्तियों में भी दंगा फसाद हो गया है अभी अभी खबर आयी है मुल्क आज़ाद हो गया है साठ बच्चे अस्पताल में तड़प तड़प के मर गये सियासत के दलालों का घर आबाद हो गया है अभी अभी खबर आयी है मुल्क आज़ाद हो गया है धर्म और ज़ुबान से थक जाते हैं … [Read more…]

Poem: रात हो चली है

रात हो चली है कोई किताब पढ़ने दो मुझे दिन के ज़ख्मों का कुछ तो हिसाब करने दो मुझे घर के हर कोने से कोई जाला गिरा जाता है अपनी ज़ख़्मों को कुछ बा नक़ाब करने दो मुझे रोशनी में छुपे रहते हैं अंधेरों में निकल आते हैं अब तो खुद से ही सवाल-ओ-जवाब करने … [Read more…]

Poem : अरमानों की चादरें

बहुत हल्के से ओढ़ रखी हैं अरमानों की चादरें थोड़ी भी हवा आती है उड़ जाती हैं   पुरज़ोर नहीं हैं ज़िंदगी के रास्ते बिखरी हुई पगडंडियां हैं कोई सख्ती से चलता है मुड़ जाती हैं   कारोबार-ए-ज़िंदगी हमारा कुछ ऐसा चल रहा है कुछ समुंदर निकल गये हम से कुछ नदियाँ जुड़ जाती हैं … [Read more…]

Poem: कुछ भी नहीं है मेरा यहाँ कुछ भी नहीं

कुछ भी नहीं है मेरा यहाँ कुछ भी नहीं ना रुखसत पे कोई आँसू ना आने पे कोई गेसू ना बाहों के कहीं घेरे ना खिलते हुए चेहरे कुछ भी नहीं है मेरा यहाँ कुछ भी नहीं ना जीने का सबब कोई ना मरने की वजह कोई ना सुबहो की कोई ख्वाइश ना शामों का … [Read more…]

Poem: डिस्पोज़ेबल रिश्ते

नये दिन हैं नयी दुनिया है और रिश्ते भी ढल गये हैं नये रंगों में समय की गति के साथ डिस्पोज़ेबल हो गये हैं और क्यूँ ना हो आख़िर कुछ वक़्त ही ऐसा है सब लोग जल्दी में हैं कोई सुबह से शाम तक रिश्तों को बढ़ता देखना चाहता है कोई एक पल में ही … [Read more…]