Poem: डिस्पोज़ेबल रिश्ते

नये दिन हैं नयी दुनिया है और रिश्ते भी ढल गये हैं नये रंगों में समय की गति के साथ डिस्पोज़ेबल हो गये हैं और क्यूँ ना हो आख़िर कुछ वक़्त ही ऐसा है सब लोग जल्दी में हैं कोई सुबह से शाम तक रिश्तों को बढ़ता देखना चाहता है कोई एक पल में ही … [Read more…]

Poem: Urdu

अदब की है ज़ुबान उर्दू मेरा तो है जहान उर्दू जज़्बात जितने भी हो उलझे कर देती है बयान उर्दू गुलज़ार की भी साहिर की भी हिंदू भी है है मुसलमान उर्दू कभी देवनागरी कभी अरबी में हर सफे को देती है जान उर्दू अवध की भी है और दिल्ली की भी अस्ल में है … [Read more…]

Poem: थक गया हूँ ज़िंदगी से

थक गया हूँ ज़िंदगी से और तेरी बंदगी से कुछ इश्क़ को आराम दूं कुछ और राहें थाम लूँ     मुड़ से गये थे रास्ते वापस उन्हें देखूं ज़रा खोलूं मैं क्या कमरा नया टूटा हुआ सीलन भरा   आवाज़ें जो घुल गयी थी ज़िंदगी के शोर में गाँठि जो पड़ गयी थी जीवन … [Read more…]

Poem: मेरी खुशियों का पौधा

कभी बड़ा नहीं होता कुछ शाखें निकलती हैं कुछ हरे पत्ते भी कुछ आशायें भी उगती है कुछ घर भी बन जाते हैं मगर फिर कोई झोंका फिर कोई टुकड़ा धूप का उड़ा देता है जला देता है कभी कभी जड़ से ही हिला देता है और बिखरी हुई शाखों में फिर से एक बीज … [Read more…]

Poem : ज़िंदा रहने का अदब

बुझती आँखों की तड़प उठती नींदों की थकन सोच में डूबे हुए मेरे माथे की शिकन साथ है मेरे भी कुछ यादों के पोशीदा सबब ढूँढते रहते हैं वो जाने क्या सुबहो और शब माज़ी की आँधी कोई रात का चाँद कहीं ज़ख़्म की वादियों में दर्द का दरिया कहीं हर रोज़ के वही बुझते हुए सिलसिले … [Read more…]

Poem : प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

कोई परिभाषा से परे आशा प्रत्याशा से परे इक हृदय में ज्वाला बन क्षीण क्षीण जलता हुआ भावनाओं के पवन से जीता और मरता हुआ संदेह और विश्वास की धाराओं से लड़ता हुआ एक पल में अल्प हो के दूजे में बढ़ता हुआ नाम क्या दूं तुझ को मैं जब खुद को ही समझा ना … [Read more…]

Vital Stats of BBG in 2015

We had a great year in 2015 as we spread our wings all over the place. Here are some stats about our FB page. Daily Page Engaged Users – 54,11,118 Daily Total Reach – 7,19,01,228 Daily Total Impressions – 21,47,30,501 Top Five Posts   ज़िन्दगी तेरे गम ने हमेंरिश्ते नए समझाए Posted by Bhoole Bisre … [Read more…]

Poem: सब तिरंगे बेचते हैं

सब तिरंगे बेचते हैं आज देखा एक बच्ची को उस गली के मोड़ पे एक हाथ में चन्द सिक्के एक मैं कुछ दस तिरंगे चेहरे पर ना कोई शिकवा ना कोई खुशी का सुराग बस एक क्रम ज़िंदगी का जो बुझाये पेट की आग सब के है अपने तरीके और फिर देखा कहीं पे एक … [Read more…]