Poem dedicated to Delhi rape victim and many more

I dedicate this to Delhi rape victim and many more who suffer silently.

वो सहमी हुई होगी
वो टूटी हुई होगी
जब एक दरिंदे ने
अपने आवेश मैं
एक नापाक कदम
उस की ओर बढ़ाया होगा
इंसानियत को उस समय
जाने क्या क्या याद आया होगा
क्या सदियों से
रूढ़िवाद से लिपटे समाज को
उस चीख का दर्द
समझ आया होगा
दरिंदे तो फिर भी
आख़िर दरिंदे हैं
पर सफ़ेदपोश लोगों के भी
ये कैसे गोरखधंधे हैं
कभी नूडल्स को और
कभी मोबाइल को
देखते नहीं कभी अपनी
दिल के मैल को
ये किस ओर
हमारा समाज अग्रसर है
इंसान हैं डरे हुए
और दरिंदों को
ना किसी का डर है
पीड़ा देने वाले
पीड़ित पे इल्ज़ाम लगाते हैं
और निष्ठुर शहरी लोग
परिवार के बहाने से
सब देख के चुप रह जाते हैं
ज़्यादा नहीं कहता ये कवि
बस इतना ही अनुरोध है
अपने बच्चों को बस इतना सिखा देना
किसी भी व्यक्ति को
चाहे वो पुरुष हो या नारी
कभी वस्तु की तरह ना समझो
क्यूँ कि टूटे हुए दिल तो फिर भी जुड़ जाते हैं
पर टूटा हुआ आत्म सम्मान नहीं

– Birla

  • We are in a tragic situation, we always were, but now it has just crossed its limits.
    इंसान हैं डरे हुए
    और दरिंदों को
    ना किसी का डर है…Wonderful Lines. 🙂

    Keep Blogging!

  • ashok

    “Find out just what people will submit to, and you have found out the exact amount of injustice and wrong which will be imposed upon them. . … The limits of tyrants are prescribed by the endurance of those whom they oppress.” Frederick Douglass (1818 – 1895), the renowned American abolitionist.

    Enough is Enough.

    “The only thing necessary for Evil to Flourish is for good men to do nothing” Edmund Burke. Let the good many rise, awake, and do SOMETHING.

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