Poem dedicated to Delhi rape victim and many more

I dedicate this to Delhi rape victim and many more who suffer silently.

वो सहमी हुई होगी
वो टूटी हुई होगी
जब एक दरिंदे ने
अपने आवेश मैं
एक नापाक कदम
उस की ओर बढ़ाया होगा
इंसानियत को उस समय
जाने क्या क्या याद आया होगा
क्या सदियों से
रूढ़िवाद से लिपटे समाज को
उस चीख का दर्द
समझ आया होगा
दरिंदे तो फिर भी
आख़िर दरिंदे हैं
पर सफ़ेदपोश लोगों के भी
ये कैसे गोरखधंधे हैं
कभी नूडल्स को और
कभी मोबाइल को
देखते नहीं कभी अपनी
दिल के मैल को
ये किस ओर
हमारा समाज अग्रसर है
इंसान हैं डरे हुए
और दरिंदों को
ना किसी का डर है
पीड़ा देने वाले
पीड़ित पे इल्ज़ाम लगाते हैं
और निष्ठुर शहरी लोग
परिवार के बहाने से
सब देख के चुप रह जाते हैं
ज़्यादा नहीं कहता ये कवि
बस इतना ही अनुरोध है
अपने बच्चों को बस इतना सिखा देना
किसी भी व्यक्ति को
चाहे वो पुरुष हो या नारी
कभी वस्तु की तरह ना समझो
क्यूँ कि टूटे हुए दिल तो फिर भी जुड़ जाते हैं
पर टूटा हुआ आत्म सम्मान नहीं

– Birla