टूटी किश्ती

इस रास्ते पे चले आये
बहुत दूर तक बिना सोचे
या शायद कुछ सोचा होगा
पर याद नहीं क्या था
कोई सैलाब आया होगा
कोई आंधी भी आई थी शायद
कुछ उड़ा के लिए गयी
और कुछ बहा के
पर कुछ तो बच ही गया
थोडा सहमा हुआ थोडा टूटा हुआ
हिम्मत कर के मेरी ओट मैं
खुद को छिपाए हुआ
पर जो रह गया
वो ज़रूरी था
जो बह गया
वो नहीं
ख्वाब चाहें उजाड़ गए हों
नसीब चाहें बिगड़ गए हों
हो अँधेरा चाहें हर ओर मेरे
हो निराशा चाहें मुझ को घेरे
जो नहीं गया वो मेरा विश्वास
जो नहीं गया वो मेरा जूनून
और न ही जाएगा वो
किसी आंधी से डर के या कोई सैलाब से
कह दो जा के इन तूफानों से इन हवाओं से
टूटी किश्ती को भी किनारे लगाने का हुनर हम को आता है
टूटी किश्ती को भी किनारे लगाने का हुनर हम को आता है