Poem : बुलबुला

Girl_blowing_bubbles

बुलबुला हूँ कुछ ही क्षण में
क्षत विक्षत हो जाऊंगा
पर अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊंगा

चाहे सतह पर ही हो मेरे
सात रंगों की चमक
चाहे अंतरमन में उपस्थित
हो एकाकी शून्य तक
एक बच्चे की ख़ुशी बन के मैं
स्वयं ही बिखर जाऊंगा

अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊंगा

किसने समझी है यहाँ पर
नटखट समय की हठाखेलियाँ
एक क्षण में प्राप्त सब है
दूजे में सब खोये यहाँ
कब तलक इन आंकड़ों में
फँस के मैं रह पाऊँगा

अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊंगा

ना तिमिर का भेदी हूँ मैं
ना कोई घर का दिया
एक पल में जी लिया
एक पल में मर लिया
लुप्त होते होते भी
बस यही दोहराऊंगा

अपने जीवन की अल्पता से
मैं नहीं घबराऊंगा