Poem: जाने क्या

जाने क्या लिखा है किताबों में
जाने क्या ये सब बोलते हैं
बचपन को बंदूक की नोक पे
धर्म के तराज़ू में तोलते हैं

काटते हैं मासूमियत को
हैवानियत की तलवार से
ज़हर ये किस रंग का
इंसानियत में घोलते हैं

ना आँसू ही रुकते हैं
ना लहू ही रुकता है
धर्म की अंधी भगदड़ में
हम सब लाशों पे दौड़ते हैं

जाएँगे कौन सी ज़न्नत में
ये धर्म के सौदागर
लाश जो मासूम बच्चों की
कमज़ोर कंधों पे छोड़ते हैं