Poem: डिस्पोज़ेबल रिश्ते

नये दिन हैं
नयी दुनिया है
और रिश्ते भी ढल गये हैं
नये रंगों में
समय की गति के साथ
डिस्पोज़ेबल हो गये हैं
और क्यूँ ना हो आख़िर
कुछ वक़्त ही ऐसा है
सब लोग जल्दी में हैं
कोई सुबह से शाम तक
रिश्तों को बढ़ता देखना चाहता है
कोई एक पल में ही
सब छोड़ देना चाहता है
आख़िर कितनी परेशानी हैं
नॉन डिस्पोज़ेबल रिश्तों में
रोज़ धोना पड़ता है
दाग और धब्बों को
हटाना पड़ता है
कभी कभी तो नुकीले रिश्तों से
हाथ कट भी जाते हैं
कभी अधुले रिश्तों से
कुछ पुराना खाना निकल आता है
कभी एक सड़ी हुई बास लिए
कभी कुछ शक्कर के दाने
और शोर भी तो नहीं होता
इन नॉन डिस्पोज़ेबल रिश्तों से
चाहे टेबल से गिरें
या गिरें कुतुब मीनार से
आख़िर हल्के होते हैं
गिरते गिरते ही एक
नया आशियाँ तलाश लेते हैं
पर कहाँ से लाए कवि मन
डिस्पोज़ेबल ज़ज़्बात
जो सुबह कुछ हों
कुछ और हों हर रात
शायद हम कभी भी
ना इन डिस्पोज़ेबल रिश्तों को
समझ पाएँगे
टूटेंगे बिखरेंगे
और कवि कहलाएँगे