Poem : अरमानों की चादरें

बहुत हल्के से ओढ़ रखी हैं
अरमानों की चादरें
थोड़ी भी हवा आती है
उड़ जाती हैं
 
पुरज़ोर नहीं हैं ज़िंदगी के रास्ते
बिखरी हुई पगडंडियां हैं
कोई सख्ती से चलता है
मुड़ जाती हैं
 
कारोबार-ए-ज़िंदगी हमारा
कुछ ऐसा चल रहा है
कुछ समुंदर निकल गये हम से
कुछ नदियाँ जुड़ जाती हैं
 
ना खुशियों की कोई ख्वाइश
ना गम से गिला कोई
क्या आशियाने बन गये तो
क्या ग़र बस्तियाँ उजड़ जाती हैं