Poetry Recital at Lahe Lahe

कुछ मर गया है मुझ में इस लिए कविता लिखता हूँ
कुछ लिखता हूँ अब बचे हुए खुद को ज़िंदा रखने के लिए

यही सच है हर एक कवि के पीछे. कुछ दर्द के साए हैं जो बरस जाते हैं अनायास ही. कुछ इस बारिश से बिखर जाते हैं और कुछ इस बारिश से संवर जाते हैं

और कुछ, जो कवि होते हैं, इन बूँदों से लाड़ियान पिरो लेते हैं. उन लड़ियों को गले में पहन लते हैं जैसे की जीवन ने उन को पदक दिए हो. कुछ ऐसी ही लाड़िया आप के सामने प्रस्तुत हैं


खुद से ही लड़ रहे हैं
मुक़दमा अपनी बेगुनाही का
इल्ज़ाम लगाने वाला
कुछ ज़्यादा ही करीब था


जाने क्यूँ तुम ने
आशियाँ समझ लिया मुझ को
ईंट पर ईंट रखी थी
कोई ज़ोड नहीं था


अधूरापन और रेखायें

 

तेरा एक अधूरापन
मेरा एक अधूरापन
शायद बहुत अलग है
या शायद बिलकुल भी नहीं
एक ही शीशे से
टूटे हुए टुकड़े
एक ही बरगद से
पत्ते जो हैं बिछड़े
लगता है कभी मिल कर
एक हो जायेंगे कभी
या बिखर जायेंगे
कभी ना जुड़ने के लिए
क्या सब के अधूरेपन
जुड़ सकते हैं कभी
हम सब को पूरा
करने के लिये
बिखरे हुए अस्तित्व को
एकत्रित करने के लिये
परन्तु बहुत रेखाएं हैं
हमारे अहंकारों के बीच में
जो कहती हैं उस पार
कोई और गाँव है
कोई और देश है
और वो रेखायें हैं
इतनी प्रबल
इतनी गहरी
कुछ सामाजिक
कुछ मानसिक
कुछ यथार्थ
कुछ कल्पित
कुछ हम को परिभाषित करती
कुछ हम को एकाकी करती
जो रोक लेती हैं
इन टुकड़ों को
एक दुसरे से मिलने से
एक अट्ठाहस सा करती हैं
हम को अधूरा देख कर
खिल्ली उडाती हैं
हमारे अल्प सहस की
कभी इन रेखाओं को
तोड़ देंगे सब
और सब अधूरेपन मिल कर
एक पूरापन बनायेंगे
तब तक बस यही है
जीवन का सारांश
अधूरापन और रेखायें


हमारी जिंदगी में जितना सही है बिल्कुल उतना ही ग़लत
इक तरफ तुम हो तो दूसरी तरफ गम जहाँ भर के


कोई परिभाषा से परे
आशा प्रत्याशा से परे
इक हृदय में ज्वाला बन
क्षीण क्षीण जलता हुआ
भावनाओं के पवन से
जीता और मरता हुआ
संदेह और विश्वास की
धाराओं से लड़ता हुआ
एक पल में अल्प हो के
दूजे में बढ़ता हुआ
नाम क्या दूं तुझ को मैं
जब खुद को ही समझा ना मैं
प्राप्य और अप्राप्य की
दुविधा में उलझा हूँ मैं
इस घुटन को जलने दो
इस को कोई आराम ना दो
प्यार को प्यार ही रहने दो
कोई नाम ना दो


बस यही सोच कर ज़िंदगी
तुझ से उम्मीद नहीं रखते
मायूस हो के इक दिन मरते हैं
उम्मीद रख के हर दिन


ज़िंदा रहने का अदब

 

बुझती आँखों की तड़प
उठती नींदों की थकन
सोच में डूबे हुए
मेरे माथे की शिकन
साथ है मेरे भी कुछ
यादों के पोशीदा सबब
ढूँढते रहते हैं वो
जाने क्या सुबहो और शब
माज़ी की आँधी कोई
रात का चाँद कहीं
ज़ख़्म की वादियों में
दर्द का दरिया कहीं
हर रोज़ के वही
बुझते हुए सिलसिले
घटती हुई ज़िंदगी
बढ़ते हुए शिकवे गिले
खाक में मिलते हुए
जज़्बातों के आशियाँ
कतरा कतरा मिटते हुए
रूह के नाम-ओ-निशान
ढूँढ लेता हूँ मैं भी
कुछ तो जीने का सबब
मौत की राहों में
ज़िंदा रहने का अदब


कैसे कर लें भरोसा हम उन की बातों का
जो हाथ छोड़ते ही नहीं अलविदा कहने के बाद


ज़िंदगी हो या लॅपटॉप
दोनों का एक ही आलम है
कुछ मोटिवेशनल कोट्स चिपका के
गहरे दागों को छुपा रखा है


मेरी खुशियों का पौधा

 

मेरी खुशियों का पौधा
कभी बड़ा नहीं होता
कुछ शाखें निकलती हैं
कुछ हरे पत्ते भी
कुछ आशायें भी उगती है
कुछ घर भी बन जाते हैं
मगर फिर कोई झोंका
फिर कोई टुकड़ा धूप का
उड़ा देता है जला देता है
कभी कभी जड़ से ही हिला देता है
और बिखरी हुई शाखों में
फिर से एक बीज ढूंढता हूँ मैं
जिस बीज से उगेगा
फिर एक पौधा
जो मुझ को भी मालूम है
पेड़ नहीं बनेगा
टूट जाएगा बिखर जाएगा
हर बार की तरह अल्प आयु में
पर कोई शक्ति या कोई पागलपन
मुझ से फिर से कहता है
उन बीजों को बिखेर दो
फिर से किसी मिट्टी में
जब कि मुझ को भी ये मालूम है
मेरी खुशियों का पौधा
कभी बड़ा नहीं होता


सहेज के रखता हूँ
अपने गमों को बिखरने नहीं देता
जो मेरे बिखरने से बने हैं
उन को बिखेरूँ कैसे


फिर सी कोई यहाँ कभी कड़वा नहीं बोलेगा
मेरे मुल्क में सब की ज़ुबान उर्दू कर दो


माना कि हिंदी माँ है मेरी
उर्दू भी महबूबा है
कौन सी महबूबा आज कल
माँ से इतना घुल मिल के रहती है


उर्दू

 

अदब की है ज़ुबान उर्दू
मेरा तो है जहान उर्दू

जज़्बात जितने भी हो उलझे
कर देती है बयान उर्दू

गुलज़ार की भी साहिर की भी
हिंदू भी है है मुसलमान उर्दू

कभी देवनागरी कभी अरबी में
हर सफे को देती है जान उर्दू

अवध की भी है और दिल्ली की भी
अस्ल में है जज़्बा-ए-हिन्दुस्तान उर्दू

अदब की है ज़ुबान उर्दू
मेरा तो है जहान उर्दू


डिस्पोज़ेबल रिश्ते

नये दिन हैं
नयी दुनिया है
और रिश्ते भी ढल गये हैं
नये रंगों में
समय की गति के साथ
डिस्पोज़ेबल हो गये हैं
और क्यूँ ना हो आख़िर
कुछ वक़्त ही ऐसा है
सब लोग जल्दी में हैं
कोई सुबह से शाम तक
रिश्तों को बढ़ता देखना चाहता है
कोई एक पल में ही
सब छोड़ देना चाहता है
आख़िर कितनी परेशानी हैं
नॉन डिस्पोज़ेबल रिश्तों में
रोज़ धोना पड़ता है
दाग और धब्बों को
हटाना पड़ता है
कभी कभी तो नुकीले रिश्तों से
हाथ कट भी जाते हैं
कभी अधुले रिश्तों से
कुछ पुराना खाना निकल आता है
कभी एक सड़ी हुई बास लिए
कभी कुछ शक्कर के दाने
और शोर भी तो नहीं होता
इन नॉन डिस्पोज़ेबल रिश्तों से
चाहे टेबल से गिरें
या गिरें कुतुब मीनार से
आख़िर हल्के होते हैं
गिरते गिरते ही एक
नया आशियाँ तलाश लेते हैं
पर कहाँ से लाए कवि मन
डिस्पोज़ेबल ज़ज़्बात
जो सुबह कुछ हों
कुछ और हों हर रात
शायद हम कभी भी
ना इन डिस्पोज़ेबल रिश्तों को
समझ पाएँगे
टूटेंगे बिखरेंगे
और कवि कहलाएँगे


बहुत हल्के से ओढ़ रखी हैं
अरमानों की चादरें
थोड़ी भी हवा आती है
उड़ जाती हैं

पुरज़ोर नहीं हैं ज़िंदगी के रास्ते
बिखरी हुई पगडंडियां हैं
कोई सख्ती से चलता है
मुड़ जाती हैं

कारोबार-ए-ज़िंदगी हमारा
कुछ ऐसा चल रहा है
कुछ समुंदर निकल गये हम से
कुछ नदियाँ जुड़ जाती हैं

ना खुशियों की कोई ख्वाइश
ना गम से गिला कोई
क्या आशियाने बन गये तो
क्या ग़र बस्तियाँ उजड़ जाती हैं


ना जीतूं तो कोई खुशियाँ
ना haroon तो कोई ग़म हो
किसी इंसान से नहीं
ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ मैं


अमन वाली बस्तियों में भी
दंगा फसाद हो गया है
अभी अभी खबर आयी है
मुल्क आज़ाद हो गया है

साठ बच्चे अस्पताल में
तड़प तड़प के मर गये
सियासत के दलालों का
घर आबाद हो गया है
अभी अभी खबर आयी है
मुल्क आज़ाद हो गया है

धर्म और ज़ुबान से थक जाते हैं
तो मुल्कों को लड़ाते हैं
तिरंगे में एक और जवान आया है
एक और घर बर्बाद हो गया है
अभी अभी खबर आयी है
मुल्क आज़ाद हो गया है

सहाफी बन बैठे हैं
आवाम के फ़र्ज़ी नुमाइंदे
फ़र्ज़ी खबरों का कारखाना
सियासत की बुनियाद हो गया है
अभी अभी खबर आयी है
मुल्क आज़ाद हो गया है

हुक्मरानी भी आज कल
हुक्मरान बच्चों में बाँट देते हैं
जम्हूरियत के धोखे में मुल्क
कुछ लोगों की ज़ायदाद हो गया है
अभी अभी खबर आयी है
मुल्क आज़ाद हो गया है


अब कभी फिर से रिश्तों की भीख नहीं मांगेंगे
भीख में लोग अक्सर खोटे सिक्के ही दिया करते हैं


कभी कभी गम का होना भी ख़ुशगवार होता है
आख़िर गम होने का भी अपना ही अहंकार होता है


रूह की बात है, बयाँ करने कहाँ जायें
मोहब्बत तुम से की है, खफा होने कहाँ जायें

शहर में वैसे तो शिवाले भी हैं कालीसे भी
इश्क़ के मोमिन हैं दुआ करने कहाँ जायें

आदत-ए-इश्क़ पुख़्ता भी है पुरानी भी
अब इस उमर में दिल कहीं और लगाने कहाँ जायें

उम्र हो चली है अब अश्कों को रोक लेते हैं
ख़ामाखाँ अब दर्द का दरिया बहाने कहाँ जायें

रूह की बात है, बयाँ करने कहाँ जायें
मोहब्बत तुम से की है, खफा होने कहाँ जायें


फिर से मुल्क ना बटने देंगे सुन लो सियासतदानों
हम तिलक लगा के दरगाहौ पे दुआ किया करते हैं


अपनों का दिल दुखेगा
गैरों को क्या सुनायें
अपने गमों के अफसाने
दिल में छुपा के रखते हैं


ना कोई सिला होता
ना कोई सबब होता
कैसा होता गर बेवजह
मोहब्बत करने का अदब होता
दिल यूँही बहक जाते
ऐसे ही अनायास ही
जब दिल में आता
तो मिल लेते
जो दिल में आता
वो कह लेते
कोई क्या सोचेगा
ना ख़याल होता
कैसे खुश रखूं
यही खुद से सवाल होता
उम्र रिश्तों की बड़ी होती
इंसानों की उमर से भी
ना डर टूटने का होता
ना बिखरने पे मलाल होता
रिश्तों के शिवाले होते
दिल में हरदम रब होता
ना कोई सिला होता
ना कोई सबब होता
कैसा होता गर बेवजह
मोहब्बत करने का अदब होता


ऐसा नहीं कि हम को,
शौक-ए-नुमाइश-ए-गम है,
पैमाना भरा है,
छलक जाता है


प्यार मोहब्बत वफा सुकून
जो जिंदगी में नहीं मिलता
शायरी में लिख लेते हैं


ज़िंदगी हम से खेलती है
और हम शब्दों से
दुनिया ख़ामाखाँ हम को
शायर समझ बैठी है


मेरी मय्यत पे वो बोले
ये बंदा भी ना
अजूबा बेहतरीन था
दिखता तो खुशमीज़ाज़ था
लिखता बहुत गमगीन था


मैं उम्दा लिखता हूँ
या ज़ाया लिखता हूँ
फिक्र नहीं इस की
जो दिल में आया लिखता हूँ


अपनी कलम से भी मैने कुछ ऐसा समझोता कर लिया
उस की सियाही लेता हूँ अपनी सियाही काग़ज़ पे उतारने के लिए


बेसबब लिखता हूँ मैं
ज़िन्दगी की चाल को
कौन समझा है यहाँ
कोई आता है
कोई जाता है
कुछ निशान छोड़ कर
कोई पहचान छोड़ कर
एक उजड़ी हुई बस्ती मैं
एक टूटा हुआ मकान छोड़ कर
ना आने का कोई सबब तेरा
ना जाने का कोई सबब है
इस लिए
बेसबब लिखता हूँ मैं
कभी हैं कदम बहुत हलके
कभी बोझ हैं बलाओं से
कभी रात कटती है इक पल मैं
कभी ख़त्म न हो क़यामत तक
नहीं जानता सहर का पता
नहीं जानता वफ़ा का घर
बढे जाते हैं कदम ये
किसी ओर किसी कारण से
और बढे जाते हैं कभी कहीं भी नहीं
बोझिल से और बेसबब
इस लिए
बेसबब लिखता हूँ मैं
ज़िन्दगी है नाव सी
कोई सागर मैं जो है गिर गयी
न कोई रास्ता न साहिल कोई
न है माझी और न पतवार ही
ये जो लहरें उस को छू रहीं
वो ही उठा रहीं और डुबा रहीं
न पता है मुझे अंजाम का
न पता है सुबहो-शाम का
कहीं पहुंचा तो वो भी बेसबब
और डूबा तो वो भी बेसबब
इस लिए
बेसबब लिखता हूँ मैं