Simply Living Hardly Thinking

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Archive for the ‘Poems’ Category

February 10th, 2013 by bkbirla

इंसानियत

सूडान के रेगिस्तान मैं
भूखे नंगे इंसान मैं
खून से लथपथ
हर सूखे हुए पथ पर
हर रोज़ मरती हूँ लेकिन
मरती नहीं हूँ मैं

अमेरिका के स्कूलों मैं
मौत के खिलोनों मैं
शिक्षक के खून मैं भींगी
बेगुनाह बच्चों की सिसकी मैं
हर रोज़ मरती हूँ लेकिन
मरती नहीं हूँ मैं

पाकिस्तान के जंगलों मैं
धर्म के दंगलों मैं
एक डरी और सहमी हुई
मलाला के स्कूल जाते वक़्त
हर रोज़ मरती हूँ लेकिन
मरती नहीं हूँ मैं

दिल्ली की बसों मैं
वहशियों के अट्टाहसों मैं
एक लोहे की नोक पे
लुटती हुई अस्मतों मैं
हर रोज़ मरती हूँ लेकिन
मरती नहीं हूँ मैं

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February 3rd, 2013 by bkbirla

वो दरख़्त

वो दरख़्त

अपनी  शाखों पे
अनजान परिंदों के
आशियाने बनाता हुआ

वो दरख़्त

एक अनजान मुसाफिर
राहों की गर्द ले के
थक कर बैठ गया
छाँव देता उस को भी

वो दरख़्त

झूमता रहता था
मदमस्त हवाओं मैं
ख़ुशी से

वो दरख़्त

आशियाँ परिंदों के
दर्द लेकिन दरख़्त का
परिंदे कुतर कुतर के
ज़ख्म देते
कतरे कतरे मैं
फिर भी मुस्कुराता

वो दरख़्त

मुसाफिर को बस
सुध थी
अपनी ही थकान की
क्या पता था उस को
कितना रोया था

वो दरख़्त

हवाओं को भी
क्या था पता
कमज़ोर था इस लिए
उसे देख झूम गया था

वो दरख़्त

बोझिल और अन्दर से कमज़ोर
खोखला और थक हुआ
वो हवाओं के साथ
झूमता नहीं था
शक्ति विहीन था
जिस ओर हवाएं ले जातीं
उसी ओर मुड जाता
मुसाफिरों और पंछियों से
क्या कह सकता था वो
पंछियों को आशियाँ देता
मुसाफिरों को छाँव
हवाओं  के साथ झूमता हुआ
बहुत टूटा हुआ था अन्दर से

वो दरख़्त

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December 30th, 2012 by bkbirla

शैतान हैं हम हैवान हैं हम

I know today is the last day of this year. I know that new year is celebration time for many. But then this year ends on a note which calls for so much of introspection as a society and also as a person for each one of us. We can blame it on politicians or police but deep within all of us know we are also responsible somewhere for it that we create a society which can be so brutal at times that life becomes worse then our worst dreams. When each one of us transforms ourselves, we create a better society.

क्या मुल्क हैं हम,
क्या क़ौम हैं हम
टूटे फूटे
इंसान हैं हम,
मूँह से खून
टपकता है
शैतान हैं हम
हैवान हैं हम

कहते हैं देवी
नारी को
ये नाटक
बहुत पुराना है
हर एक नज़र
लेकिन अपनी
वहशी भी है
और ज़ालिम भी
शैतान हैं हम
हैवान हैं हम

बुर्क़ा पर्दा
और सती
नारी के हिस्से ही
क्यूँ आया
ढकने और जलाने से
किस का रुतबा
है बढ़ पाया
बहुरुपीए हैं
बेदर्द हैं हम
बिन बुनियाद के
मकान हैं हम
शैतान हैं हम
हैवान हैं हम

कब तक
इस दोजख दुनिया मैं
खेलेंगे हम
इंसानी जिस्मों से
कब तक
अस्मत के सौदागर
घूमेंगे आज़ाद
परिंदों से
तब तक
शर्मिंदा हो कर एक कवि
ये सब को याद दिलाएगा
क्या मुल्क हैं हम,
क्या क़ौम हैं हम
टूटे फूटे
इंसान हैं हम,
मूँह से खून
टपकता है
शैतान हैं हम
हैवान हैं हम
- Birla

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December 18th, 2012 by bkbirla

Poem dedicated to Delhi rape victim and many more

I dedicate this to Delhi rape victim and many more who suffer silently.

वो सहमी हुई होगी
वो टूटी हुई होगी
जब एक दरिंदे ने
अपने आवेश मैं
एक नापाक कदम
उस की ओर बढ़ाया होगा
इंसानियत को उस समय
जाने क्या क्या याद आया होगा
क्या सदियों से
रूढ़िवाद से लिपटे समाज को
उस चीख का दर्द
समझ आया होगा
दरिंदे तो फिर भी
आख़िर दरिंदे हैं
पर सफ़ेदपोश लोगों के भी
ये कैसे गोरखधंधे हैं
कभी नूडल्स को और
कभी मोबाइल को
देखते नहीं कभी अपनी
दिल के मैल को
ये किस ओर
हमारा समाज अग्रसर है
इंसान हैं डरे हुए
और दरिंदों को
ना किसी का डर है
पीड़ा देने वाले
पीड़ित पे इल्ज़ाम लगाते हैं
और निष्ठुर शहरी लोग
परिवार के बहाने से
सब देख के चुप रह जाते हैं
ज़्यादा नहीं कहता ये कवि
बस इतना ही अनुरोध है
अपने बच्चों को बस इतना सिखा देना
किसी भी व्यक्ति को
चाहे वो पुरुष हो या नारी
कभी वस्तु की तरह ना समझो
क्यूँ कि टूटे हुए दिल तो फिर भी जुड़ जाते हैं
पर टूटा हुआ आत्म सम्मान नहीं

- Birla

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November 20th, 2012 by bkbirla

Jab Tak Hai Kaan

Naushad ke sangeet ki mastiyan
OP Nayyar ki mast dhunein
Shankar Jaikishan ki allhad sangeet
SD da ke dil chhone wale geet
Nahin bhooloonga main
Jab tak hai kaan, Jab tak hai kaan

Anu Malik ka shor
Bappi Lahri ke disco geet
Pritam ki churayi hui dhunein
Nadeem-Shravan ka ho ho ho
Nahin maaf karoonga main
Jab tak hai kaan, Jab tak hai kaan
- Birla

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November 8th, 2012 by bkbirla

दीवाली की रात

इस रात ये ज़िंदगी ठिठुरेगी सहम जाएगी
इस रात दीवाली हम से ना मनाई जाएगी

कुछ अरसे से रौशनी हम से नाराज़ रही
कुछ अरसे से मध्यम ज़िंदगी की आवाज़ रही
इस रात दिल की लौ सुबक सुबक के सो जाएगी
इस रात दीवाली हम से ना मनाई जाएगी

लाशों के साए उभरते हैं खून की नदियों से
इंसान का दुश्मन बना है इंसान ही सदियों से
इस रात जाने कितनी ज़िंदगियाँ अधूरी ही खो जाएँगी
इस रात दीवाली हम से ना मनाई जाएगी

ये पटाखों की आवाज़ें ये रोशनी से भरे दिए
अंधेरे दिल के गहराई मैं धुआँ सा भर दिए
आज दिल की तन्हाई दिल को ही कैसे समझाएगी
इस रात दीवाली हम से ना मनाई जाएगी

एक बच्चा भूखे पेट शहर की रोशनियों मैं सो जाएगा
एक बच्चा मीठे की दुकान देख कर ललचाएगा
अमीरों के घर की रोशनी कब ग़रीबों का घर चमकाएगी
इस रात दीवाली हम से ना मनाई जाएगी

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August 20th, 2012 by bkbirla

उड़ चलो उड़ चलो

उन्मुक्त आसमान मैं, भय रहित उड़ चलो
बंधनों को तोड़ के, उड़ चलो उड़ चलो

काल के ललाट पर, चिन्ह छोड़ दो प्रबल
जोश की मशाल ले, उड़ चलो उड़ चलो

राह मैं जो आएँगी, मुश्किलें विशाल सी
तोड़ के हर ग्रहण, उड़ चलो उड़ चलो

है प्रकाश अल्प यहाँ, है तिमिर अति प्रचुर
ह्रदय से तुम प्रकाश कर, उड़ चलो उड़ चलो

विश्व मैं तो हैं कई, बाँटने के तंत्र षड्यंत्र
जोड़ने की लौ जला, उड़ चलो उड़ चलो

 

I used few lines from this poem in a ZopNow ad.

 

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February 10th, 2012 by bkbirla

Poem: Ek Shabd

कभी एक शब्द का मुझे
हर घड़ी इंतेज़ार रहता है
कभी एक शब्द के लिए
मेरा दिल बेकरार रहता है

कभी एक शब्द कैसे पल भर मैं
सारे रिश्ते बिखेर देता है
कभी एक शब्द हम को यादों के
जंगल मैं घेर लेता है

कभी एक शब्द दिल के दरिया मैं
कोई आस घोल जाता है
कभी एक शब्द जाने कितने दरवाज़े
एक घड़ी मैं खोल जाता है

उसी एक शब्द को कहे
कोई आज मुझ से भी
उसी एक शब्द का मुझे
हर घड़ी इंतेज़ार रहता है

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December 25th, 2011 by bkbirla

Poem: Ek Ashq

Ek ashq aankhon se nikalta hai, Aur dil main utar jaata hai
Waqt ki karwatein badalte hi, Har oor bikhar jaata hai

Zindagi ki kadwahat, Aur safar ki gard ko
Dhote dhote hi, Na jane kitna waqt guzar jaata hai

Sambhalo chaahein jitna, ashqon ko palkon ke tale
Jab sailab umadta hai, to had se guzar jaata hai

Nahin likha hai har ek ashq pe, pochhne wale ka pata
Kandhe ko dekh kar, khud-ba-khud hi utar aata hai

Mere ek ashq ki, keemat hi kya hai is duniya main
Pani ka katra hi to, un ko nazar aata hai

Ham bhi ho jayenge gum, kisi roz kisi mode pe to
Aise jeene se to, ji apna bhi bhar jaata hai

Ek ashq aankhon se nikalta hai, Aur dil main utar jaata hai

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August 24th, 2011 by bkbirla

एकाकी मन के विस्तृत पटल पे

एकाकी मन के विस्तृत पटल पे
स्मृति की रेखाएं इंगित हैं

कुछ इतनी सूक्ष्म
कि प्रतीत भी नहीं होंती
कुछ इतनी गहरी
कि नींव को भी
विधवंसित कर दें

एकाकी मन के विस्तृत पटल पे…
इन रेखाओं मैं
छुपे हैं
अनगिनत क्षण
प्रसन्नता के
उन्मुक्त उल्लास के
गहन पीड़ा के
टूटे हुए विश्वास के
कुछ ऐसे जो मुझे
निशब्द कर गए
कुछ ऐसे जो
बरस पड़े
आहट दिए बिना ही

एकाकी मन के विस्तृत पटल पे…
अध्यन किया है
इन का प्रचुर
परिपक्वता से
सुख और दुख़ का
लेखा जोखा
सुख मिलता है
बिसरे हुए
मार्गों से
जहाँ प्रत्याशा
परोक्ष न हो
दुख़ तो आ जाता है
अनायास ही
क्षुब्ध करने को
एकाकी मन के विस्तृत पटल पे…
As I grow a year older, I thought I should try something I have not done before and I tried writing a poem in pure Hindi.
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