Poem : सरहद

इक बार कभी इस सरहद पे कुछ ऐसा भी हो जाए तुम भी कुछ गीत सूनाओ हम भी कुछ गाने गायें   बहुत हो चुका खेल खून का अब थोड़ा संगीत करें तुम छेड़ो एक नुसरत की धुन हम भी रफ़ी के गीत कहें   माज़ी में तो खून है टपका तेरा भी और मेरा … [Read more…]

Poem : मुल्क आज़ाद हो गया है

अमन वाली बस्तियों में भी दंगा फसाद हो गया है अभी अभी खबर आयी है मुल्क आज़ाद हो गया है साठ बच्चे अस्पताल में तड़प तड़प के मर गये सियासत के दलालों का घर आबाद हो गया है अभी अभी खबर आयी है मुल्क आज़ाद हो गया है धर्म और ज़ुबान से थक जाते हैं … [Read more…]

Poem: रात हो चली है

रात हो चली है कोई किताब पढ़ने दो मुझे दिन के ज़ख्मों का कुछ तो हिसाब करने दो मुझे घर के हर कोने से कोई जाला गिरा जाता है अपनी ज़ख़्मों को कुछ बा नक़ाब करने दो मुझे रोशनी में छुपे रहते हैं अंधेरों में निकल आते हैं अब तो खुद से ही सवाल-ओ-जवाब करने … [Read more…]

Poem : अरमानों की चादरें

बहुत हल्के से ओढ़ रखी हैं अरमानों की चादरें थोड़ी भी हवा आती है उड़ जाती हैं   पुरज़ोर नहीं हैं ज़िंदगी के रास्ते बिखरी हुई पगडंडियां हैं कोई सख्ती से चलता है मुड़ जाती हैं   कारोबार-ए-ज़िंदगी हमारा कुछ ऐसा चल रहा है कुछ समुंदर निकल गये हम से कुछ नदियाँ जुड़ जाती हैं … [Read more…]

Poem: कुछ भी नहीं है मेरा यहाँ कुछ भी नहीं

कुछ भी नहीं है मेरा यहाँ कुछ भी नहीं ना रुखसत पे कोई आँसू ना आने पे कोई गेसू ना बाहों के कहीं घेरे ना खिलते हुए चेहरे कुछ भी नहीं है मेरा यहाँ कुछ भी नहीं ना जीने का सबब कोई ना मरने की वजह कोई ना सुबहो की कोई ख्वाइश ना शामों का … [Read more…]

Poem: डिस्पोज़ेबल रिश्ते

नये दिन हैं नयी दुनिया है और रिश्ते भी ढल गये हैं नये रंगों में समय की गति के साथ डिस्पोज़ेबल हो गये हैं और क्यूँ ना हो आख़िर कुछ वक़्त ही ऐसा है सब लोग जल्दी में हैं कोई सुबह से शाम तक रिश्तों को बढ़ता देखना चाहता है कोई एक पल में ही … [Read more…]

Poem: Urdu

अदब की है ज़ुबान उर्दू मेरा तो है जहान उर्दू जज़्बात जितने भी हो उलझे कर देती है बयान उर्दू गुलज़ार की भी साहिर की भी हिंदू भी है है मुसलमान उर्दू कभी देवनागरी कभी अरबी में हर सफे को देती है जान उर्दू अवध की भी है और दिल्ली की भी अस्ल में है … [Read more…]

Poem: थक गया हूँ ज़िंदगी से

थक गया हूँ ज़िंदगी से और तेरी बंदगी से कुछ इश्क़ को आराम दूं कुछ और राहें थाम लूँ     मुड़ से गये थे रास्ते वापस उन्हें देखूं ज़रा खोलूं मैं क्या कमरा नया टूटा हुआ सीलन भरा   आवाज़ें जो घुल गयी थी ज़िंदगी के शोर में गाँठि जो पड़ गयी थी जीवन … [Read more…]

Poem: मेरी खुशियों का पौधा

कभी बड़ा नहीं होता कुछ शाखें निकलती हैं कुछ हरे पत्ते भी कुछ आशायें भी उगती है कुछ घर भी बन जाते हैं मगर फिर कोई झोंका फिर कोई टुकड़ा धूप का उड़ा देता है जला देता है कभी कभी जड़ से ही हिला देता है और बिखरी हुई शाखों में फिर से एक बीज … [Read more…]

Poem : ज़िंदा रहने का अदब

बुझती आँखों की तड़प उठती नींदों की थकन सोच में डूबे हुए मेरे माथे की शिकन साथ है मेरे भी कुछ यादों के पोशीदा सबब ढूँढते रहते हैं वो जाने क्या सुबहो और शब माज़ी की आँधी कोई रात का चाँद कहीं ज़ख़्म की वादियों में दर्द का दरिया कहीं हर रोज़ के वही बुझते हुए सिलसिले … [Read more…]