Poem : प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

कोई परिभाषा से परे आशा प्रत्याशा से परे इक हृदय में ज्वाला बन क्षीण क्षीण जलता हुआ भावनाओं के पवन से जीता और मरता हुआ संदेह और विश्वास की धाराओं से लड़ता हुआ एक पल में अल्प हो के दूजे में बढ़ता हुआ नाम क्या दूं तुझ को मैं जब खुद को ही समझा ना … [Read more…]

Poem: सब तिरंगे बेचते हैं

सब तिरंगे बेचते हैं आज देखा एक बच्ची को उस गली के मोड़ पे एक हाथ में चन्द सिक्के एक मैं कुछ दस तिरंगे चेहरे पर ना कोई शिकवा ना कोई खुशी का सुराग बस एक क्रम ज़िंदगी का जो बुझाये पेट की आग सब के है अपने तरीके और फिर देखा कहीं पे एक … [Read more…]

Poem: ऊर्जा और परिभाषा

देखा है कभी सूरज को उगते हुए और डूबते हुए क्या फर्क होता है थोड़ा रौशनी का और बहुत कुछ   निकलता है सुबह सुबह एक जोश के साथ बहुत ऊर्जा लिए हुए सुबह का संचार करते हुए हर कण कण में एक स्वर्णिम चादर बिखेर तेता है प्रकृति के हर आयाम में प्राण भर … [Read more…]

Poem: Tum kaun the

तुम कौन थे जो आये थे मेरी जीवन में एक झोंका हवा का बन के कई रूप में कई रँग में कभी एक मित्र बन के कभी एक दार्शनिक बन के वो सब कुछ बन के जो मेरे अधूरेपन को भर देता था कुछ सुन्दर पलों से तुम कौन थे याद है मुझे तुम्हारा चेहरा … [Read more…]

Poem : ज़िंदगी के धागे

ज़िंदगी के धागे बहुत कमज़ोर हो चले हैं टूटते तो हैं पर जुड़ते नहीं उलझ जाते हैं एक दूसरे से कभी लगते हैं मिलते हुए कभी लगते हैं एक विरोधाभास खुद से ही खुद का कभी कोई सोच और कभी कोई और मन का अंतर्द्वंद और वो भी अंतहीन कटुता के प्रतिबिंब कभी तो कभी … [Read more…]

Poem: जाने क्या

जाने क्या लिखा है किताबों में जाने क्या ये सब बोलते हैं बचपन को बंदूक की नोक पे धर्म के तराज़ू में तोलते हैं काटते हैं मासूमियत को हैवानियत की तलवार से ज़हर ये किस रंग का इंसानियत में घोलते हैं ना आँसू ही रुकते हैं ना लहू ही रुकता है धर्म की अंधी भगदड़ … [Read more…]

Poem : एक आह

  एक आह की ज़िंदगी भी आख़िर ज़िंदगी क्या होती है एक ज़ख़्म से उभरती है एक ज़ख़्म में फ़ना होती है क्या कहें किस से कहें ये ज़ुबान गद्दार है दर्द की इंतेहा तो बस आँखों से बयान होती है गुम हो जाएँगे हम भी आख़िर दस्तूर-ए-खुदाई है अभी तो रूह मेरी हर दिन … [Read more…]