Poem: ऊर्जा और परिभाषा

देखा है कभी सूरज को उगते हुए और डूबते हुए क्या फर्क होता है थोड़ा रौशनी का और बहुत कुछ   निकलता है सुबह सुबह एक जोश के साथ बहुत ऊर्जा लिए हुए सुबह का संचार करते हुए हर कण कण में एक स्वर्णिम चादर बिखेर तेता है प्रकृति के हर आयाम में प्राण भर … [Read more…]

Poem: Tum kaun the

तुम कौन थे जो आये थे मेरी जीवन में एक झोंका हवा का बन के कई रूप में कई रँग में कभी एक मित्र बन के कभी एक दार्शनिक बन के वो सब कुछ बन के जो मेरे अधूरेपन को भर देता था कुछ सुन्दर पलों से तुम कौन थे याद है मुझे तुम्हारा चेहरा … [Read more…]

Poem : ज़िंदगी के धागे

ज़िंदगी के धागे बहुत कमज़ोर हो चले हैं टूटते तो हैं पर जुड़ते नहीं उलझ जाते हैं एक दूसरे से कभी लगते हैं मिलते हुए कभी लगते हैं एक विरोधाभास खुद से ही खुद का कभी कोई सोच और कभी कोई और मन का अंतर्द्वंद और वो भी अंतहीन कटुता के प्रतिबिंब कभी तो कभी … [Read more…]

Poem: जाने क्या

जाने क्या लिखा है किताबों में जाने क्या ये सब बोलते हैं बचपन को बंदूक की नोक पे धर्म के तराज़ू में तोलते हैं काटते हैं मासूमियत को हैवानियत की तलवार से ज़हर ये किस रंग का इंसानियत में घोलते हैं ना आँसू ही रुकते हैं ना लहू ही रुकता है धर्म की अंधी भगदड़ … [Read more…]

Poem : एक आह

  एक आह की ज़िंदगी भी आख़िर ज़िंदगी क्या होती है एक ज़ख़्म से उभरती है एक ज़ख़्म में फ़ना होती है क्या कहें किस से कहें ये ज़ुबान गद्दार है दर्द की इंतेहा तो बस आँखों से बयान होती है गुम हो जाएँगे हम भी आख़िर दस्तूर-ए-खुदाई है अभी तो रूह मेरी हर दिन … [Read more…]

Poem : बुलबुला

बुलबुला हूँ कुछ ही क्षण में क्षत विक्षत हो जाऊंगा पर अपने जीवन की अल्पता से मैं नहीं घबराऊंगा चाहे सतह पर ही हो मेरे सात रंगों की चमक चाहे अंतरमन में उपस्थित हो एकाकी शून्य तक एक बच्चे की ख़ुशी बन के मैं स्वयं ही बिखर जाऊंगा अपने जीवन की अल्पता से मैं नहीं … [Read more…]

Poem – इस पेड़ पे जो लटकी हैं, वो लाशें नहीं हैं

    इस पेड़ पे जो लटकी हैं, वो लाशें नहीं हैं खुशबू थीं वो किसी घर की इज़्ज़त थी किसी के दर की खेलती थी कभी शायद इसी पेड़ के तले छुपती थी कभी शायद इस पेड़ की ओट में और शायद कभी इस पेड़ पे चढ़ के खेल भी होगा पर आज वो … [Read more…]

Poem : ज़िन्दगी में

कितने लगायें अब पैबन्द ज़िन्दगी में हो चुके हैं सब रास्ते अब बंद ज़िन्दगी में   रिसते हैं अब तो ज़ख्म लहू से कभी अश्कों से अपने भी हुआ करते थे हौसले बुलंद ज़िन्दगी में   लम्हों को जाने मुझ से ये कैसी दुश्मनी है मुझ को भी मिलते ख़ुशी के चंद ज़िन्दगी में   … [Read more…]

बेसबब लिखता हूँ मैं

बेसबब लिखता हूँ मैं ज़िन्दगी की चाल को कौन समझा है यहाँ कोई आता है कोई जाता है कुछ निशान छोड़ कर कोई पहचान छोड़ कर एक उजड़ी हुई बस्ती मैं एक टूटा हुआ मकान छोड़ कर ना आने का कोई सबब तेरा ना जाने का कोई सबब है इस लिए बेसबब लिखता हूँ मैं … [Read more…]

टूटी किश्ती

इस रास्ते पे चले आये बहुत दूर तक बिना सोचे या शायद कुछ सोचा होगा पर याद नहीं क्या था कोई सैलाब आया होगा कोई आंधी भी आई थी शायद कुछ उड़ा के लिए गयी और कुछ बहा के पर कुछ तो बच ही गया थोडा सहमा हुआ थोडा टूटा हुआ हिम्मत कर के मेरी … [Read more…]