2nd anniversary of getting fired up

Yup. It is two years now. Precisely two years back I got fired from my own company – my Steve Jobs moment. The reason I write this is not to settle any scores or to vent out but I have realized over the years that this has helped lot of people to understand the startup … [Read more…]

Poem: ऊर्जा और परिभाषा

देखा है कभी सूरज को उगते हुए और डूबते हुए क्या फर्क होता है थोड़ा रौशनी का और बहुत कुछ   निकलता है सुबह सुबह एक जोश के साथ बहुत ऊर्जा लिए हुए सुबह का संचार करते हुए हर कण कण में एक स्वर्णिम चादर बिखेर तेता है प्रकृति के हर आयाम में प्राण भर … [Read more…]

BBG at 5 – the story so far and the road ahead

It happened approximately 5 years back. A usual day at office sparked off the idea of starting a FB page to share songs. Songs which I used to hear with so much as a kid and teenager, and I had not heard in recent past. The vision was very simple. Just share songs with friends … [Read more…]

Poem: Tum kaun the

तुम कौन थे जो आये थे मेरी जीवन में एक झोंका हवा का बन के कई रूप में कई रँग में कभी एक मित्र बन के कभी एक दार्शनिक बन के वो सब कुछ बन के जो मेरे अधूरेपन को भर देता था कुछ सुन्दर पलों से तुम कौन थे याद है मुझे तुम्हारा चेहरा … [Read more…]

The curious case of mobile strategy

So who is right. Myntra or Facebook/Whatsapp. As we speak, Myntra/Flipkart are rolling total mobile app strategy and FB and Whatsapp have launched web versions of their popular mobile apps. It is simplistic to look into strategy of large organizations and derive industry trends from that but it is not that straightforward always. Industry players who … [Read more…]

Poem : ज़िंदगी के धागे

ज़िंदगी के धागे बहुत कमज़ोर हो चले हैं टूटते तो हैं पर जुड़ते नहीं उलझ जाते हैं एक दूसरे से कभी लगते हैं मिलते हुए कभी लगते हैं एक विरोधाभास खुद से ही खुद का कभी कोई सोच और कभी कोई और मन का अंतर्द्वंद और वो भी अंतहीन कटुता के प्रतिबिंब कभी तो कभी … [Read more…]

Poem: जाने क्या

जाने क्या लिखा है किताबों में जाने क्या ये सब बोलते हैं बचपन को बंदूक की नोक पे धर्म के तराज़ू में तोलते हैं काटते हैं मासूमियत को हैवानियत की तलवार से ज़हर ये किस रंग का इंसानियत में घोलते हैं ना आँसू ही रुकते हैं ना लहू ही रुकता है धर्म की अंधी भगदड़ … [Read more…]